General Knowledge in Hindi – महात्मा गांधी किस जाति के थे, यह सवाल अक्सर सामान्य ज्ञान में पूछा जाता है, लेकिन बहुत कम लोग इसका सही और संतुलित उत्तर जानते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनका परिवार परंपरागत रूप से वैश्य वर्ण से संबंधित माना जाता है और वे मोध बनिया समुदाय से थे। उस समय भारतीय समाज में जाति व्यवस्था सामाजिक पहचान का एक अहम हिस्सा थी, लेकिन गांधी जी ने अपने जीवन और विचारों से इस व्यवस्था की सीमाओं को लगातार चुनौती दी। उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर रियासत में दीवान थे, जिससे परिवार को सामाजिक सम्मान प्राप्त था। हालांकि, गांधी जी ने कभी अपनी जाति को श्रेष्ठ या विशेष बताने का प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत, उन्होंने छुआछूत, भेदभाव और ऊँच-नीच की भावना का खुलकर विरोध किया। इसलिए यह जानना जरूरी है कि गांधी जी की जाति से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके विचार, नैतिक मूल्य और सामाजिक सुधारों के लिए किया गया संघर्ष था, जिसने पूरे देश को नई दिशा दी।

गांधी जी की जाति और पारिवारिक पृष्ठभूमि
गांधी जी का संबंध मोध बनिया समुदाय से था, जिसे वैश्य वर्ण के अंतर्गत माना जाता है। वैश्य वर्ग परंपरागत रूप से व्यापार, वाणिज्य और प्रशासनिक कार्यों से जुड़ा रहा है। गांधी जी का परिवार भी प्रशासनिक सेवा में सक्रिय था, खासकर उनके पिता, जो दीवान के पद पर कार्यरत थे। इस पृष्ठभूमि ने गांधी जी को बचपन से ही अनुशासन, ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा के मूल्य सिखाए। हालांकि, उस दौर में जाति सामाजिक अवसरों को प्रभावित करती थी, लेकिन गांधी जी ने इसे कभी अपने विचारों की सीमा नहीं बनने दिया। उन्होंने अलग-अलग समुदायों के लोगों के साथ रहकर उनके दुख-दर्द को समझा। दक्षिण अफ्रीका और भारत में उनके अनुभवों ने उन्हें यह एहसास कराया कि जाति और रंग के आधार पर भेदभाव मानवता के खिलाफ है।
गांधी जी का जाति व्यवस्था पर दृष्टिकोण
गांधी जी स्वयं भले ही वैश्य समुदाय में जन्मे हों, लेकिन उन्होंने जाति व्यवस्था की कठोरता का हमेशा विरोध किया। वे वर्ण व्यवस्था को कर्म पर आधारित मानते थे, न कि जन्म पर। छुआछूत को वे पाप मानते थे और दलित समुदाय के लिए उन्होंने “हरिजन” शब्द का प्रयोग किया। उनका मानना था कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब हर व्यक्ति को समान सम्मान और अवसर मिले। उन्होंने आश्रमों में सभी जातियों के लोगों को एक साथ रहने, खाने और काम करने के लिए प्रेरित किया। गांधी जी का यह दृष्टिकोण उस समय के लिए क्रांतिकारी था, क्योंकि समाज गहरे जातिगत भेदभाव से ग्रस्त था।
सामाजिक सुधारों में गांधी जी की भूमिका
गांधी जी ने सामाजिक सुधारों को स्वतंत्रता संग्राम से अलग नहीं माना। उनके लिए स्वराज का अर्थ केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी भी था। उन्होंने मंदिर प्रवेश आंदोलन का समर्थन किया और दलितों को सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। कई बार उन्हें अपने ही समर्थकों की आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। गांधी जी का मानना था कि अगर समाज के एक हिस्से को हीन समझा जाएगा, तो देश कभी सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकता।
आज के संदर्भ में गांधी जी की सोच
आज के आधुनिक भारत में भी जाति का सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में गांधी जी के विचार हमें आत्ममंथन का अवसर देते हैं। उन्होंने सिखाया कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से तय होता है। गांधी जी की सोच हमें यह समझने में मदद करती है कि सामाजिक समरसता केवल कानून से नहीं, बल्कि मानसिकता बदलने से आती है।
